ये ज़बॉ हम से सी नहीं जाती
ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती
इन फ़सीलो में वो दराड़े हैं
जिन में बस कर नमी नहीं जाती
देखिये उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती
शाम कुछ पेड़ गिर गए वर्ना
बाम तक चाँदनी नहीं जाती
एक आदत सी बन गयी है तू
और आदत कभी नहीं जाती
मय-कशो मय जरूरी है लेकिन
इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती
मुझ को ईशा बना दिया तुम ने
अब शिकायत भी की नहीं जाती
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