तुम अँधेरी रात लाओ मैं सजाऊ दीपमाला
तुम करो बाधा उपस्थित मैं कहूँ उसको सुअवसर
शाप का स्वागत करू मैं माँग कर वरदान सुन्दर
मैं उतारू आरती तुमको बनाकर यज्ञशाला
मृत्रिका के पात्र लघु में वर्तिका – लघु स्नेह थोड़ा
पर तुम्हारी रात से मैंने किस विधि नेह जोड़ा
कम न अब सुख के उजाले में मुझे दुःख का अँधेरा
तुम अँधेरी रात लाओ मैं सजाऊ दीपमाला
एक लम्बी आयु तक चलकर नहीं जो हाथ आया
वेग से चलकर व्यथित उर ने उसे तत्काल पाया
प्रश्न जो दिन भर टला वह रात में बिलकुल ना टाला
तुम अँधेरी रात लाओ मैं सजाऊ दीपमाला
एक दिन बुझना सभी को हार बुझने में ना होती
जीत जलने में निहित है जीत धुति बूझकर न खोती
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