पूछते हो तुम की मेरे पास क्या है?
क्या नहीं है ?
बादलों का दर्द, बिजली की तड़प, आँसू घटा के,
रात की स्याही, सितारों की जलन,सिसकी पवन की।
आह फूलों की कि जिनका तन विंधा है कण्टकों से,
उस पपीहे की व्यथा, करुणा जहाँ सारे भुवन की।
वेदना से कीमती हीरे नहीं, मोती नहीं हैं।
पूछते हो तुम की मेरे पास क्या है?
क्या नहीं है ?
कौन हैं वे पुतलियाँ जिनको नहीं पानी मिला है,
प्राण है कोई यहाँ जो पीर का पाला नहीं हो ?
साँस है कोई कि जो उच्छवास की दासी नहीं हो,
पैर है कोई कि जिसके वछ पर छाला नहीं हो ?
आँख वह देखी नहीं जो फूटकर रोती नहीं है।
पूछते हो तुम की मेरे पास क्या है?
क्या नहीं है ?
विश्र्व-भर का दर्द, आँसू, सिसकियाँ, उच्छवास, छाले,
जिस जगह आकर मिले हैं सब, वहाँ कवि का ह्रदय है।
एक सीमित बिंदु से लेकर, असीमित सागरों तक,
जिस जगह खेले-खुले हैं सब, वहाँ कवि का ह्रदय है।
दीन है वह मन जहाँ समवेदना होती नहीं है।
पूछते हो तुम की मेरे पास क्या है?
क्या नहीं है ?
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