ओ मेरे सूर्यमुखी संबोधन – Poem

ओ मेरे सूर्यमुखी संबोधन
कब तक यूं अनसुने रहोगे ?
एक सुखद भोर की प्रतीक्षा में
कब तक यूं तिमिर ही पियोगे ?
सारे संबंध प्यास के
मरुस्थल की झील हो गये
सारे संदर्भ प्यार के
नभ के कंदील हो गये
ओ मेरे गीतमुखी आवाहन
कब तक बन अजनबी फिरोगे ?
महुए के तन वाले भी
बात में बबूल हो गये
जो थे हर दर्द की दवा
नस – नस में दर्द बो गये
ओ मेरे गंधमुखी आकर्षण
कब तक अज्ञात ही जियोगे ?
पत्थर के महानगर में
गीत के गुलाब नुच गये ?
एक छाँव की तलाश में
परिचय के पाँव थक गये
ओ मेरे छंदमुखी आमंत्रण
कब तक उपहास ही सहोगे ?

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