एक शहर है तुम्हारे अंदर
सुना है आजकल वहां रहते नहीं हो
बहुत कुछ है दिल और दिमाग के दरमियाँ
दूसरों की तो छोडो,
वो खुद से भी कहते नहीं हो।
एक शहर है तुम्हारे अंदर …
कुछ लोगों के लिए जहां तुमने
शहर का हर दरवाज़ा खोल दिया था
जब शहर में हिस्सा माँगा उन्होंने
तुमने हर हिस्सा बिन मोल दिया था।
पर फिर …
तुम्हारी उम्मीदों और खुशियों को ही
अपनी तिजारत बना ली उन्होंने
तुम्हारी सकून वाली झील के पास
मतलबों की इमारत बना ली उन्होंने।
अपने इरादों के औजार से
शहर का हर हिस्सा तोड़ दिया,
चल दिए किसी दूसरे शहर
और तुम्हे अपने ही शहर में अकेला छोड़ दिया।
उस बंजर ज़मीन को
फिर से खिलखिलाना जरूरी है
तुम्हे तुम्हारे उस शहर से
फिर से मिलाना जरूरी है
जरूरी है क्योंकि ….
इन समंदर के किनारों सी जिंदगियों में
अपने कदमो के निशान क्यों ढूंढना
जब एक पूरे शहर के मालिक हो तुम
तो किसी और के शहर में मकान क्यों ढूंढना।
अपनी हर बंजारी उम्मीद से कहो
आराम से इस शहर में रहना,
और सुनो ….
इस शहर की चाबी,
कभी किसी और को मत देना।
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