मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो गजल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहां राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
हर तरफ ऐतराज होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड गया जब से
और ज्यादा वजन उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएया
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
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