मेरे स्वप्न तुम्हरे पास सहारा पाने आएंगे
इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएंगे
हौले हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत
हम सब अपने अपने दीपक यही सिराने आएंगे
थोड़ी आंच बची रहने दो थोड़ा धुआं निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आएंगे
उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
वो आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आएंगे
फिर अतीत के चक्रवात में दृस्टि ना उलझा लेना तुम
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आएंगे
रह रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढे तो शायद दृस्य सुहाने आएंगे
हम क्यों बोलें इस आंधी में कई घरौंदे टूट गए
इन असफल निर्मिर्तिओं के शव कल पहचानें जायेंगे
हम इतिहास नहीं रच पाए इस पीड़ा में दहते हैं
अब जो धाराएं पकड़ेंगे इसी मुहाने आएंगे
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