हो गयी है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिएΙ आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी की यह बुनियाद हिलनी चाहिएΙ हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिएΙ सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद…
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ वो गजल आपको सुनाता हूँ एक जंगल है तेरी आँखों में मैं जहां राह भूल जाता हूँ तू किसी रेल सी गुजरती है मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ हर तरफ ऐतराज होता है मैं अगर रौशनी में आता हूँ एक बाज़ू उखड गया जब से और ज्यादा वजन…
मेरे स्वप्न तुम्हरे पास सहारा पाने आएंगे इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएंगे हौले हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत हम सब अपने अपने दीपक यही सिराने आएंगे थोड़ी आंच बची रहने दो थोड़ा धुआं निकलने दो तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आएंगे उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता…